कभी-कभी लगता है कि मुंबई क्रिकेट टीम सिर्फ लाल बल्लेबाज़ों और नीले लोगो वाली एक टीम नहीं है। वो तो एक साँस है, एक धड़कन है, जो इस शहर की रग-रग में समाई हुई है। मैं जब भी मुंबई के लिए खेलती टीम को देखता हूँ, लगता है जैसे पूरा शहर, उसकी आशाएं, उसका गुरूर, उसकी मेहनत, वही बाइस गज की पिच पर उतर आई है। ये कोई महज़ मैच नहीं होता, ये तो एक भावना होती है।
मुझे बचपन की याद है,
जब रेडियो पर बॉबी तल्यारकर या सुनील गावस्कर का स्कोर पढ़ा जाता था, तो पिताजी का चेहरा चमक उठता था। वो कहते थे, "देखो, ये मुंबई का बल्लेबाज है। इनकी तैयारी अलग होती है।" तब समझ नहीं आता था कि आखिर 'मुंबई की तैयारी' में ऐसा क्या खास है।
बड़ा होने पर, इस टीम के इतिहास में झांकने पर पता चला कि ये तो एक 'क्रिकेट की फैक्ट्री' है, जहाँ से न सिर्फ रन बनाने वाले, बल्कि लड़ने वाले खिलाड़ी तैयार होते हैं। रणजी ट्रॉफी में 41 बार चैंपियन बनने का रिकॉर्ड कोई दुर्घटना नहीं है। ये तो लगातार दशकों की अनुशासन, समर्पण और एक 'खास मानसिकता' का नतीजा है।
ये वही है जो मुंबई शहर को चलाती है -
'काम करो, बिना शोर मचाए' यहाँ दादर के मैदान की धूप में पसीना बहाने वाला लड़का, भले ही आज अनजान हो, कल सचिन तेंदुलकर बन सकता है। यहाँ खेलना सिर्फ प्रतिभा के बल पर नहीं, बल्कि जज़्बे के दम पर होता है।
मैंने कई पुराने खिलाड़ियों के इंटरव्यू में सुना है, मुंबई की कप्तानी करना सबसे मुश्किल काम है। क्योंकि हर कोई आपसे बस एक ही उम्मीद रखता है - जीत। दूसरा कोई विकल्प नहीं। ये दबाव ही, शायद, हीरों को तराशता है।
और क्या ही हीरे हैं जो यहाँ से निकले हैं!
सचिन का स्ट्रेट ड्राइव, सुनील गावस्कर की तकनीक, दिलीप वेंगसरकर की गरिमा, राहुल द्रविड़ का धैर्य (हालाँकि वो कर्नाटक से हैं, लेकिन उन्होंने मुंबई क्रिकेट से बहुत कुछ सीखा), और ऋषभ पंत जैसे युवा-सबने इसी मिट्टी में पनपकर दमखम दिखाया।
ये सिर्फ नाम नहीं हैं, ये वो अध्याय हैं जिनसे भारतीय क्रिकेट की कहानी लिखी गई है। मुंबई टीम की सबसे बड़ी पहचान यही रही है कि उसने 'टेलेंट' को 'टेंपरामेंट' में ढाला है। यहाँ आप सिर्फ शतक नहीं लगाते, आप पारी को बचाते हैं, टीम को जिताते हैं।
आज के दौर में चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं
आईपीएल का जमाना है, युवा सीधे टी-20 की रौशनी में आना चाहते हैं। ऐसे में, रणजी जैसी लंबी प्रतियोगिताओं में वही पुराना जुनून बनाए रखना आसान नहीं। फिर भी, जब आप मुंबई टीम को देखते हैं, तो लगता है कि कुछ चीजें नहीं बदलतीं।
लाल स्वेटर अभी भी उतना ही भारी है, क्योंकि उस पर इतिहास का भार है। हार के बाद की चुप्पी अभी भी उतनी ही गहरी होती है, और जीत पर मुस्कान उतनी ही संतुष्ट।
एक फैन के तौर पर मेरे लिए सबसे यादगार पल वो होते हैं जब टीम मुश्किल में होती है। पारी की शुरुआत खराब हो, स्कोरबोर्ड पर संकट दिखे और फिर कोई नौजवान या कोई अनुभवी खिलाड़ी, चेहरे पर बिना किसी हड़बड़ी के, संभालने आए। ऐसा लगता है जैसे पूरा वानखेड़े स्टेडियम, नहीं, पूरा शहर, एक साथ सांस रोके खड़ा है। और फिर जब विजय की घंटी बजती है तो वो एहसास अतुलनीय होता है. ये जीत सिर्फ टीम की नहीं,
हर उस शख्स की होती है जो लोकल ट्रेन में क्रिकेट की बहस करता है, जो छत पर एंटीना घुमाकर मैच देखता है, जो ऑफिस में कंप्यूटर के पीछे स्कोर अपडेट चेक करता रहता है। सच कहूँ तो, मुंबई क्रिकेट टीम मेरे लिए क्रिकेट से भी आगे की चीज है।
ये शहर की पहचान का एक हिस्सा है, जिस तरह समुद्र, वडा पाव और गेटवे ऑफ इंडिया हैं। ये हमें सिखाती है कि चाहे पिच कितनी भी मुश्किल हो, आप तकनीक, दिमाग और दिल से खेलो। हार भी जाओ, तो सम्मान के साथ।
ये टीम हमारे अंदर के उस जुनून को जगाती है,
जो कहता है- "खेलो वैसे, जैसे यही आखिरी मौका है।" आज भी जब कोई युवा मुंबई के लिए पहली बार क्रीज पर कदम रखता है, वो सिर्फ अपने करियर की शुरुआत नहीं कर रहा होता।
वो एक विरासत को आगे बढ़ा रहा होता है, उन लाखों सपनों को अपने कंधों पर लेकर चल रहा होता है जो इसी शहर की गलियों, मैदानों और छतों से निकले हैं। और हम, दर्शक, बस यही दुआ करते हैं कि यह सिलसिला यूँ ही चलता रहे।
क्योंकि जब तक मुंबई की यह टीम मैदान पर है, हमें यकीन है कि क्रिकेट का वो 'खास मुंबईया तड़का' बरकरार रहेगा और हमारे दिल की धड़कन उसकी हर रन के साथ, ताल से बजती रहेगी।
